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Sunday, August 20, 2017

how to work with soft pastels.. [krishna -sakhi]

HOW TO WORK WITH SOFT PASTEL [krishna -sakhi]


In this article you can learn how to work with pastel colours pencils and this is the very nice example for those who want to work with pastels. Pastels are easy to use like crayons and can be used to create multiple shades which eventually gives you a better drawing experience. The colours being intense and bright, don't get washed out from the surface keeping your drawing long lasting..

pastel work krishna sakhi - bmanikarts.in

एक राधा एक मीरा..
दोनों ने शाम को चाहा...
अंतर क्या दोनों की प्रीत में बोलो...
एक प्रेम दीवानी एक दरस दीवानी...

           हाय... मैं भी उसकी ही एक दीवानी हूं जिसके पीछे सिर्फ गोपियां ही नहीं, राधा और मीराबाई भी दीवानी हो गई थी। हां.. वो ही.. नटखट नंदलाला, सबका लाड़ला, मैय्या यशोदा का लाल, और पूरे वृंदावन का प्यारा... जिसके प्यार और शरारत ने सारी दुनिया को मोहित कर दिया है..।  उस कान्हा की रंग रूप प्यार भरे स्वरूप से कोई नहीं बच पाया..। 

              उस नंदकिशोर को पाने के लिए सबको न जाने कितने कष्ट उठाने पड़े। उसकी रासलीला ने सभी गोपियों को प्रसन्न कर दिया..। सारी गोपियों के दुख उसने एक पल में हर लिए। उसी के प्यार में मैं भी पागल बन बैठी हूं..।  और आज वो मुझे मिल ही गया... । उसकी बासुरी की धुन ने मेरा मन मोहित कर दिया.. उसके रूप भाव को देखकर अब तो मैं मेरी ही ना रही..। उस पाने कि खुशी मेरे पूरे रोम रोम से बयान हो रही है..। और इसी खुशी को मैं भी उसी की तरह बासूरी बजाकर बयान कर रही हूं..। बसुरी की धुन कान्हा के पास होने का एहसास कराती है। और उसका वो ' मोर पंख '...!
                जिस तरह उसके मोर पंख में ढेर सारे रंग है ठीक उसी मोर पंख की तरह कान्हा ने मेरे जीवन में खुशी और प्यार के ढेरों रंग भर दिए है। मेरे मन को उसने मोह , माया, स्वार्थ ऐसी भावनाओं से आजाद कर दिया है..। अब बस प्यार और निस्वार्थ ही मुझ में बाकी है..। और बस कान्हा ही कान्हा मेरे मन में है.। उसके सिवा मुझे कुछ और नजर ही नहीं आता.. और ना उसके सिवा मुझे कुछ और चाहिए.। मुझे सिर्फ मेरा कान्हा चाहिए..। 
              
pastel work krishna sakhi - bmanikarts.in

 पर क्या करूं..? कैसे उसे अपने पास रोक के रखूं..? वो तो उस मोरपंख की तरह ही है.. हवा के झोंके के साथ वो कहीं पर भी दूर दूर चला जाता है..। कभी यहां तो कभी वहां..? वो नटखट नंदलाल कभी किसी के हाथ नहीं आया.., मैय्या यशोदा को भी जिसने अपनी शरारतों से परेशान कर दिया था..। उस कान्हा को में अपने पास कैसे रोकुं..? डर लगता है उसे खोने का.. अगर कान्हा कहीं चला गया तो मैं उसके बिना कैसे जीऊंगी..? उस खोने का ख्याल भी मुझे बैचैन कर रहा है... क्या करूं मैं..?    
           उसके लिए बांसुरी बजाऊ..? उसके लिए गीत गाऊ.. या फिर उसके लिए नाच करूं...??  नहीं... मैं उसे जाने नहीं दे सकती.. मेरा कान्हा अब मेरी जिंदगी है.. उसके बिना मेरे जीने का कोई मतलब ही नहीं है.. 
         हां... मैं उसे डोरी से बांध के ही रखती हूं... जैसे उस चित्र में मोरपंख को बांध के रखा है..। मैं भी मेरे कान्हा को ऐसे ही बांध के रख देती हूं.. फिर तो वो कहीं नहीं का पाएगा.. यह चित्र भी शायद मेरे ही भाव प्रकट कर रहा है...। बांसुरी बजाती हुई बैचैन मैं और वो मोरपंख जैसा मेरा कान्हा.. जिसे मैंने डोरी से बांध के रखा है..। हां... यह मैं ही हूं.... इस चित्र में.... मैं और मेरा कान्हा...  

                   SHORT VIDEO ON THIS PAINTING



                                                 

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