Butterfly.... ( मेरी आजादी ) - Bmanik Arts

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Sunday, November 3, 2019

Butterfly.... ( मेरी आजादी )

🦋Butterfly.... ( मेरी आजादी )🦋

बन के तितली दिल उड़ा उड़ा उड़ा...

कही दूर दूर दूर....
         
      काश मैं भी उस तितली की तरह ही होती..। जब चाहे जहां चाहे बेखौफ उड़कर यहां से वहां जाती। कभी इस फूल पर तो कभी उस फूल पर... जी भर के घूमती.. अपने मन पसंद के फूल मैं खुद चुनती।


Butterfly.... ( मेरी आजादी )

 काश ऐसा कभी हो पाता..? पर मैं तितली नहीं हूं .. इंसान हूं.. सिर्फ इंसान नहीं एक औरत हूं.. दुर्भाग्य से शायद..। हां दुर्भाग्य... जिस औरत को देवी समझकर भूतकाल में पूजा जाता था आज उसी देवी के रूप को मैं खुद दुर्भाग्य कह रही हूं। क्या करू..? हमारे समाज आज नारी को इसी हालत में लाकर रख दिया है। जहां ना नारी की कोई कदर करता है और ना उसकी गरिमा की किसी को फिक्र है।
          पुरुषों के इस समाज ने मुझे बेड़ियों में कैद कर के रख दिया है। इस चित्र की तरह... इस चित्र की मर्यादाएं मुझे समाज की मर्यादाओं के भांति ही नजर आती है। जिस तरह हमारा यह पुरुषों का समाज एक नारी को उसके स्वतंत्रता से दूर कर के उसे अपनी बेफिजूल, बेमतलब की मर्यादाओं में कैद करके रख दिया है। उसी तरह इस चित्र ने भी इस स्त्री को अपने आप मैं कैद करके रख दिया है। ना यह समाज उसे खुल के सोचने कि इजाज़त देता है और ना मनचाहे जीने की..। पैदा होने से लेकर इस दुनिया को अलविदा कहने तक हर काम इस समाज के दायरे में रहकर ही करना पड़ता है। अगर में थोड़ा भी इस समाज से हटकर सोचूं या कुछ करूं तो लोगों की कटु बातें सुननी पड़ती है। ना मैं किसी के खिलाफ बोल सकती हूं और ना अपने पसंद से जी सकती हूं।  मेरा अस्तित्व इस चित्र की तरह ही एक शोभनीय वस्तुं के भांति बनकर रह गया है। जिस तरह से इस चित्र की स्त्री अपने कदम बाहर रखकर चित्र से आजाद होने की कोशिश कर रही है, कुछ उसी तरह मुझे भी इस समाज की मर्यादाओं से बाहर निकलने की इच्छा होती है। मेरे सपने मुझे अपनी तरह खींच रहे है। मुझे आजाद होने के लिए मजबूर कर रहे है। मुझे वो तितलियां मेरे सपनो के जैसी ही लगती है। वो तितलियां मुझे पुकार रही है.. अपने साथ खेलने के लिए बुला रही है.. मैं भी उनके साथ जाना चाहती हूं । वो जहां ले जाए वहां बेखौफ उनके पीछे दौड़ना चाहती हूं। इन सब से दूर अपने जहां में जहां किसी का कोई बंधन, मर्यादा ना हो।
            मैं भी उन तितलियों की तरह ही हूं.. मैं अपनी आजादी जी रही हूं मुझे जो अच्छा लगता है वहीं मैं कर रही हूं। बस यह खयाल आते ही मेरा तन मन खुशियों से फुलें नहीं समा रहा। और यही खयाल इस चित्र से बयान हो रहा है। मेरी आजादी, हर नारी की आजादी, उसकी खुशी, उसका अस्तित्व, उसका आजादी का सबसे सुंदर सपना इस सुंदर चित्र से प्रसारित हो रहा है।
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 Detailed painting step by step -- 

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